कुशोत्पाटिनी एकादशी

सम्पूर्ण वर्ष तक काम आता है कुशोत्पाटिनी,

अमावास्या के दिन में ग्रहण किया गया कुश ।।

भाद्रपद मास की अमावास्या तिथि में कुश ग्रहण

करने के कारण कुशोत्पाटिनी नाम से विख्यात हो गयी
है । इसी अमावास्या के दिन ग्रहण किया गया कुश वर्ष
भर के लिये धार्मिक कार्यों के अतिरिक्त श्राध्दादि कार्यों
के लिये प्रयोग होता है । यह तिथि पूर्वान्हव्यापिनी ली
जाती है ,वैदिक अनुष्ठानों से लेकर सभी प्रकार के
धार्मिक कार्यों के अलावा श्राध्दादि कर्मकाण्डों में कुश
की अनिवार्यता होती है ।
शब्दकल्पद्रम के अनुसार:–
#पूजाकालेसर्वदैवकुशहस्तो_भवेच्छचिः ।

कुशेनरहितापूजाविफलाकथिता_मया ।।

अतः प्रत्येक गृहस्थ को इस दिन कुश का संचय

करना चाहिये ।शास्त्र में दस प्रकार के कुशों का विवरण
प्राप्त होता है :–

कुशाःकाशायवादूर्वाउशीराश्च_सकुन्दकाः ।

गोधूमाब्राह्मयोमौञ्जादशदर्भाः_सबल्वजा ।।

वैदिक काल से ही दस प्रकार के कुशों का प्रयोग

होता रहा है जिसमें दर्भाः नामक कुशा सर्वश्रेष्ठ मानी
जातीहै ,कुशा में जड़ वाला भाग तथा पत्तियों बाला
भाग पूर्ण होना चाहिये ,क्योंकि कुशा के मूल में बृह्मा
जी मध्य भाग में विष्णु तथा अग्र भाग में शंकरजी
का निवास होने के कारण देव तथा पितृ दोनों कार्यों
के लिये उपयुक्त मानी गयी है ।
उल्लेखनीय है कि कुश उत्पाटन करने के लिये
इसी तिथि को पूर्वान्हकाल में दर्भस्थल पर जाकर पूर्व
या उत्तर दिशा में मुख करके बैठ जाने के बाद #हुँफट . बोलकर दाहिने हाथ से से कुशा ग्रहण कर लेना चाहिये । #विरञ्चिनासहोत्पन्ना_परमेष्ठिन्निसर्गज ।

नुदसर्वाणिपापानिदर्भस्वस्तिकरो_भव ।।

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