ॠषि पञ्चमी पूजन | लेख पढ़ें

💥ऋषि पञ्चमी 1 सितम्बर 2022 विशेष💥

“भाद्रपद शुक्ल ऋषि पंचमी अनुष्ठान”

(पुरुषों की तरह- ‘ऋषि पंचमी व्रत’
स्त्रियों को भी करना चाहिए)

“ऋषि पञ्चमी” व्रत भाद्रपद शुक्ल
पंचमी को मनाया जाता है।

“ऋषि पंचमी”
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व्रत जाने अन्जाने मे हुये पापों के
प्रक्षालन के लिये किया जाता है। यदि
पंचमी तिथि चतुर्थी एवं षष्टी से संयुक्त
हो तो ऋषि पंचमी का व्रत चतुर्थी से
संयुक्त पंचमी को किया जाता है,
न कि षष्ठीयुक्त पंचमी को। कई समाज इस दिन “रक्षाबंधन” भी करतें हैं।

“ऋषि पंचमी महामहोत्सव” के पावन पर्व पर- सप्तर्षि एवं अरुंधति को-
एवं “श्रीगर्ग अंगीराऋषि जयन्ती” पर-
श्रद्धा पूर्वक समस्त ऋषियों को-
“सादर नमन” करते हुए, आप सभी को- “हार्दिक शुभकामनाएं”!!!

ऋषि मन्त्र द्रष्टा, मन्त्र स्रष्टा और
युग सृजेता होते हैं। समाज में जो
भी उत्तम प्रचलन, प्रथा-परम्पराएं हैं,
उनके प्रेरणा स्रोत ऋषिगण ही हैं।
इन्होंने विभिन्न विषयों पर महत्त्वपूर्ण
शोध किए हैं।

यथा-व्यासजी ने गहन वेद ज्ञान को
सुबोध्य पुराण ज्ञान के रूप में रूपान्तरित
कर ज्ञानार्जन का मार्ग प्रशस्त किया।
चरक, सुश्रुतादि आयुर्विज्ञान पर
अनुसन्धान किए।

जमदग्रि-याज्ञबल्क्य यज्ञ विज्ञान पर
शोध प्रयोग किये। वशिष्ठ ने ब्रह्मविद्या
व राजनीति विज्ञान तथा विश्वामित्र ने
गायत्री महाविद्या का रहस्योद्घाटन
किया। नारद जी ने भक्ति साधना के
अनमोल सूत्र दिए। पर्शुराम ने
ऊंच-नीचादि जातिगत भेद-वैमनष्य
का निराकरण किया। भगीरथ ने
जल विज्ञान की महत्ता को समझकर
धरती पर गंगावतरण का पुनीत
पुरुषार्थ किया। पतंजलि ने योग
विज्ञान की विविध साधना मार्ग
प्रस्तुत किए। अन्य ऋषियों ने भी
व्यापक समाज हित के कार्य किए
हैं जिनका मानव जाति सदा ऋणी
रहेगी। ये सभी ऋषि भारतीय
संस्कृति के उन्नायक, युग सृजेता,
मुक्तिमार्ग का पथ प्रदर्शक, राष्ट्रधर्म
के संरक्षक, व्यष्टि-समष्टि की
समस्त गति, प्रगति और सद्गति के
उद्गाता हैं। संसार के तमाम रहस्यमय
विद्याओं की खोज, उन पर प्रयोग,
समाज में सत्पात्रों को उनकी
शिक्षा दीक्षा, उनकी सहायता से
अभिनव समाज निर्माण जैसे
महत्त्वपूर्ण कार्य सब इन महान
ऋषियों की ही देन हैं।

“भाद्रपद शुक्ल ऋषि पंचमी अनुष्ठान”
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व्रत के दिन व्रत करने वाले को गंगा,
नर्मदा या किसी अन्य नदी अथवा सरोवर
तालाब में स्नान करना चाहिये, यदि यह
सम्भव न हो तो घर के पानी में गंगाजल
मिलाकर स्नान करना चाहिये। ‘तर्पण’
तथा आह्लिक कृत्य करने के उपरान्त
अग्निहोत्र शाला में जाना चाहिए,
तत्पश्चात पुजाघर या घर में पूर्व की
ओर एक साफ-सुथरे स्थान को गोबर
से लीपकर तांबे का जल भरा कलश
रखकर वेदी बनाकर उस पर विविध
रंगों से अष्टदल कमल का चित्रण बनाएँ।
पूजा स्थान में आकर पंचगव्य ग्रहण
करें। चोकी पर नवीन वस्त्र बिछाकर
गणेश, गौरी, षोडश मातृका, नवग्रह
मंडल, सर्वतोभद्र मंडल बनाकर ताम्र,
स्वर्ण या मिट्टी का कलश स्थापित करें।
कलश के पास ही अष्टदल कमल पर
“सप्त ऋषि”- गौतम, भारद्वाज, विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि।

इन सप्तर्षियों सहित देवी अरुंधती की
स्थापना करें। चोकी पर एक ओर पूजा
के निमित्त यज्ञोपवीत को भी स्थापित
करें। देवताओं सहित सप्तर्षियों,
अरुंधती आदि का षोडशोपचार
पूजन करें। सबसे महान कार्य होता है।
प्रत्येक जीव-जंतु और मानव की रक्षा
करना। अरुंधति महान तपस्वीनी थी।
अरुंधति ऋषि वसिष्ठ की पत्नी थी।
आज भी अरुंधति सप्तर्षि मंडल में
स्थित वसिष्ठ के पास ही दिखाई
देती हैं।उसके बाद सप्त ऋषियों
की प्रतिमाओं को पंचामृत में
नहलाना चाहिए, उन पर चन्दन लेप,
कपूर लगाना चाहिए, पुष्पों, सुगन्धित
पदार्थों, धूप, दीप, श्वेत वस्त्रों,
यज्ञोपवीतों, अधिक मात्रा में नैवेद्य
से पूजन करना चाहिए। और मन्त्रों
के साथ अर्ध्य चढ़ाना चाहिए।

“अर्घ्यमन्त्र”
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“कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो
विश्वामित्रोय गौतम:।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च
सप्तैते ऋषय: स्मृता:॥
गृह्णन्त्वर्ध्य मया दत्तं
तुष्टा भवत मे सदा॥”

मासिक धर्म के समय लगे पाप से
छुटकारा पाने के लिए यह व्रत स्त्रियों
द्वारा भी किया जाना चाहिए।
इस व्रत में ब्रह्मचर्य का पालन किया
जाता है। इसके करने से सभी पापों एवं
तीनों प्रकार के दु:खों से छुटकारा मिलता
है तथा सौभाग्य की वृद्धि होती है। जब
नारी इसे सम्पादित करती है तो उसे
आनन्द, सुख, शान्ति एवं सौन्दर्य, तथा
पुत्रों एवं पौत्रों की प्राप्ति होती है।।

व्रतार्क, व्रतराज आदि ने भविष्योत्तर
से उद्धृत कर बहुत-सी बातें लिखी हैं !!
जहाँ कृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनायी
गयी एक कथा भी है। जब इन्द्र ने
त्वष्टा के पुत्र वृत्र का हनन किया तो
उन्हें ब्रह्महत्या का अपराध लगा। उस
पाप को चार स्थानों में बाँटा गया, यथा
अग्नि (धूम से मिश्रित प्रथम ज्वाला में),
नदियाँ (वर्षाकाल के पंकिल जल में),
पर्वत (जहाँ गोंद वाले वृक्ष उगते हैं)
में तथा स्त्रियों को (रजस्वला) में।
अत: मासिक धर्म के समय लगे
पाप से छुटकारा पाने के लिए यह
व्रत स्त्रियों द्वारा किया जाना चाहिए।

इसका संकल्प यह है
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“अहं ज्ञानतोऽज्ञानतो वा
रजस्वलावस्यायां
कृतसंपर्कजनितदोष
परिहारार्थमृषिपञ्चमी
व्रतं करिष्ये।”

ऐसा संकल्प करके अरून्धती
के साथ सप्तर्षियों की पूजा
करनी चाहिए।

इस दिन प्रायः दही और साठी का
चावल खाने का विधान है। नमक का
प्रयोग सर्वथा वर्जित है। हल से जुते
हुए खेत का अन्न खाना वज्र्य है।
दिन में केवल एक ही बार भोजन
करना चाहिए। कलश आदि पूजन
सामग्री को ब्राह्मण को दान कर देना
चाहिए। पूजन के पश्चात् ब्राह्मण भोजन कराकर ही स्वयं प्रसाद पाना चाहिए।
ऋषियों की वंशावली एवं ‘कथा’ श्रवण
करने का भी विधान है। सप्तर्षियों
की प्रसन्नता हेतु ब्राह्मणों को विभिन्न
प्रकार के दान-दक्षिणा देकर संतुष्ट
करना चाहिए।

व्रत कथा
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एक साहूकार साहुकारनी थे। साहुकारनी रजस्वला होकर रसोई के सब काम करती थी। कुछ समय बाद उसके एक पुत्र हुआ। पुत्र का विवाह हो गया। साहूकार ने अपने घर एक ऋषि महाराज को भोजन पर बुलाया। ऋषि महाराज ने कहा मैं बारह वर्ष में एक बार खाना खाता हूँ। पर साहूकार ने महाराज को मना लिया। साहूकार ने पत्नी से कहा आज ऋषि महाराज भोजन पर आयेंगे। उस समय स्त्री रजस्वला थी उसने भोजन बनाया और ऋषि को भोजन परोसते ही भोजन कीड़ो में बदल गया यह देख ऋषि ने साहूकार साहुकारनी को श्राप दे दिया , की तू अगले जन्म में कुतिया बनेगी और तू बैल बनेगा। साहूकार ने ऋषि के पांव पकड़ बहुत विनती की तब ऋषि ने कहा तेरे घर में ऐसी कोई वस्तु हैं क्या जिस को तेरी पत्नी की नजर नहीं पड़ी , नहीं छुआ। तब साहूकार ने छिके पर दही पड़ा था ऋषि को पिलाया।

ऋषि हिमालय पर तपस्या के लिए चले गये ।साहूकार साहुकरनी की मृत्यु हो गई श्राप वश साहूकार बैल बन गया और साहुकारनी कुतिया बन गई। दोनों अपने बेटे के घर पर रहने लगे। साहूकार का बेटा बैल से बहुत काम लेता खेत जोतता , खेत की सिचाई करता। कुतिया घर की चौकीदारी करती।

एक वर्ष बीत गया उस लडके के पिता का श्राद्ध आया। श्राद्ध के दिन अनेक पकवान बनाये खीर भी बनाई थी। एक उडती हुई चील के मुहं का सर्प उस खीर में गिर गया यह वहाँ बैठी कुतिया ने देख लिया। कुतिया ने सोचा यदि इस खीर को लोग खायेगे तो मर जायेंगे जब उसकी बहूँ देख रही थी कुतिया ने खीर में मुंह डाल दिया क्रोध में आकर बेटे बहूँ ने बहुत मारा।

जब रात हुई तो कुतिया बैल के पास जाकर रोने लगी बोली आज तुम्हारा श्राद्ध था बहुत पकवान मिले होंगे तब बैल ने कहा आज खेत पर बहुत काम था और खाना भी नही मिला कुतिया ने भी अपनी आप बीती बता दी और कहा आज बेटे बहूँ ने बहुत मारा यह सारी बाते बेटे ने सुन ली बेटे ने बहुत बड़े बड़े ऋषि मुनियों को बुलाया ऋषि मुनियों को सारी बात बताई तब ऋषि मुनियों ने कहा “ तुम्हारे यहाँ जो कुतिया हैं वह तुम्हारी माँ हैं और बैल रूप में तुम्हारे पिता हैं। तब लडके ने माता पिता को इस योनी से किस प्रकार मुक्ति मिलेगी इसका उपाय पूछा तब ऋषियों ने कहा ! ऋषि पंचमी को ऋषियों का पूजन कर उस ब्राह्मण भोज का पूण्य इन्हें मिले तथा ऋषिगण अपना आशीर्वाद दे। व्रत के पुण्य से तुम्हारे माता पिता इस योनी से मुक्त होकर स्वर्ग में स्थान प्राप्त करेंगे। उसने ऐसा ही किया और स्वर्ग से विमान आया और उस लडके के माता पिता को मोक्ष प्राप्त हुआ।#ऋषिपंचमी
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सप्तऋषि

आप सभी ने आकाश में सप्तऋषि नामक तारों को जरूर देखा होगा, दरअसल उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान सात ऋषि के आधार पर ही रखे गए हैं। वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है। https://fb.watch/ffTlEwHZ4B/ जानते हैं वे सात ऋषि कौन-कौन हैं

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( 1 ) वशिष्ठ : – ये राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ थे। वशिष्ठ के कहने पर ही राजा दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ भेज दिया था।

( 2 ) विश्वामित्र : – ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।

( 3 ) कण्व : – कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।

( 4 ) भारद्वाज : – वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे, लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था।

( 5 ) अत्रि : – ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे।

( 6 ) वामदेव : – वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं।

( 7 ) शौनक : – शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे।

।। जय श्री हरि ।।
~~~~~ऋषि पंचमी …
सप्तऋषियों की विशेष पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार सप्तऋषियों को सौरमंडल में भी स्थान दिया गया है। रात के समय सप्तऋषि तारामंडल आसानी से दिखाई देता है।
वैसे तो वैज्ञानिकों ने कई तारा मण्डलों की खोज की है, लेकिन सप्तऋषि तारामंडल के विषय में हजारों साल पहले ही ग्रंथों में बता दिया गया था। हिन्दू धर्म में चार वेद बताए गए हैं ।
ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद।
इन वेदों के लिए मंत्रों की रचना इन सप्तऋषियों ने ही की है। वेदों को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है और इन वेदों में मंत्रों की रचना करने वाले ऋषियों को इस महान योगदान के लिए सप्तऋषि तारामंडल में स्थान दिया गया है। ये उत्तर दिशा में दिखाई देता है।

ये हैं सप्तऋषि
सप्तऋषियों के नाम इस प्रकार हैं…

  1. वशिष्ठ, 2. विश्वामित्र, 3. कण्व, 4. भारद्वाज, 5. अत्रि, 6. वामदेव और 7. शौनक।
    हम सब इन्ही सप्तऋषियों की ही संताने है । इन्ही के नाम पर हमारे गोत्र है । जिसका जो गोत्र है वही ऋषि उनके पुरखे हैं। रात में सप्तऋषि तारामंडल से मालूम होती है दिशा पुराने समय में जब दिशा बताने वाले यंत्र नहीं थे, तब समुद्र यात्रा के समय दिन में तो सूर्य को देखकर दिशा का ज्ञान हो जाता था, लेकिन रात में ध्रुव तारे को और सप्तऋषि तारामंडल को देखकर दिशा का ज्ञान होता था। ये उत्तर दिशा में दिखाई देते हैं।#ऋषिपंचमी का महत्त्व
    व्रत के अनुसार अगर कोई महिला इस व्रत को करती हैं तो उसके पिछले जन्म के पाप धुल जाते हैं। पिछले जन्म में हुए पापों को भुलाने के लिए इस जन्म में इस व्रत को करना अच्छा माना जाता हैं।।

ऋषिपंचमी का इतिहास

धार्मिक मान्यताओं की माने तो कहा जाता है कि एक सदाचारी ब्राह्मण था। उस ब्राह्मण की पत्नी पवित्र मानी जाती थी। उसकी पत्नी का नाम सुशीला था और उसके 1 पुत्र व 1 पुत्री थी। उसकी पुत्री विवाह योग्य होने के बाद उसकी पुत्री का विवाह कुलशील वर के साथ कर दिया। उसके कुछ समय बाद वह विधवा हो गई।
इसके बाद उसके शरीर में कीड़े पड़ जाते हैं। उसने यह बात उसकी माँ को बताई। इसके बाद कुछ ज्ञानी क्रियाओं से इस घटना का पता लगाया गया तब पता चला कि वो पिछले जन्म में एक ब्राह्मणी थी और उसने रजस्वला होते ही पूजन के बर्तन छु लिए थे। इस जन्म में भी इनसे ऋषि का व्रत नहीं किया, इसलिए उसके शरीर में कीड़े पड़े। उसके बाद से ही इस व्रत का महत्त्व बढ़ा।

ऋषिपंचमी का महत्त्व

इस त्यौहार का हिन्दू धर्म में काफी महत्त्व दिया जाता हैं। इसके अनुसार अगर कोई महिला इस व्रत को करती हैं तो उसके पिछले जन्म के पाप धुल जाते हैं। पिछले जन्म में हुए पापों को भुलाने के लिए इस जन्म में इस व्रत को करना अच्छा माना जाता हैं। सुहागिनी महिला अगर इस व्रत को करती हैं तो उससे उसके पाप तो धुलते ही हैं साथ ही उसकी मनोकामनाएं भी पूरी हो जाती हैं।

ऋषि पंचमी का त्यौहार कब मनाया जाता हैं?
देश में ऋषि पंचमी का त्यौहार हर साल हिंदू पंचांग के अनुसार, ऋषि पंचमी का हिंदू त्यौहार भद्रपद महीने में शुक्ल पक्ष के पांचवें दिन (पंचमी तीथी) पर मनाया जाता है। इस साल यह त्यौहार 1 सितम्बर को मनाई जायेगी। ऋषि पंचमी को हिन्दू धर्म में काफी मान्यता दी जाती है। इस त्यौहार को मानाने से माना जाता हैं कि हमारे पिछले पाप धुल जाते हैं।

ऋषिपंचमी पूजा विधि

ऋषि पंचमी की पूजा किस तरह से की जाती हैं। इसके बारे में भी जानना जरुरी हैं। किसी भी त्यौहार और व्रत में उसकी विधि सबसे ज्यादा जरुरी होती है।

इस दिन महिलाएं सुबह सबसे पहले अपने घर की साफ़-सफाई करती हैं और स्नान कर साफ़ कपडे पहनती हैं। उसके बाद महिलाएं पूरे विधि विधान के साथ ऋषि और अरुंधती की स्थापना करती हैं। इस सप्त ऋषि की पूजा में हल्दी, पान, सुपारी, चन्दन, रोली, अबीर, गुलाल, मेहंदी, अक्षत, वस्त्र,फल फूलों इत्यादि से की जाती हैं।

इस व्रत में महिलाएं महावरी के दोहरान अपने पुराने पापों को याद करती हुई ऋषियों से क्षमा मांगती हैं। पूजा के बाद सप्त ऋषि की कथाएं सुनती हैं। इस दिवस पर महिलाएं जमीन से उगे हुए अन्न को ग्रहण नहीं करती बल्कि पसाई धान से बने चावल खाती हैं। इस व्रत का उद्यापन माहवारी के समाप्त होने यानी वृद्धावस्था में किया जाता है।

ऋषिपंचमी पूजा की तैयारी कैसे करें?

इस दिवस के उपलक्ष में महिलाएं सुबह जल्दी उठती हैं और साफ़-सफाई के बाद खुद स्नान करती है। ऋषि पंचमी के दिन ऋषि पंचमी की पूजा के लिए एक छोटे से कुंड को तैयार करती हैं। इसके बाद कुछ जरुरी सामान जैसे हल्दी, चन्दन, रोली, अबीर, गुलाल इत्यादि को इकठ्ठा कर उस कुंड में और उसके आसपास सजाती हैं। इसके बाद ऋषि पंचमी की कथा के साथ इस कुंड की पूजा करती हैं और अपने पिछले कर्मों की माफ़ी मांगती हैं।आजीवन .संपूर्ण
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