जोशीमठ बचाओ ! उत्तराखण्ड

फेसबुक – मनीष तिवारी जी के कलम से : १२ : #जोशीमठ_आपातकाल

पिछले कई दिनों से मैं एक बहुत दबी सी खबर पर अपनी दृष्टि अनवरत बनाए हुए था। हो सकता है आपने भी ध्यान दिया हो। हालांकि यह समाचार आपको सीधे प्रभावित नहीं करता पर….

यह खबर प्रभावित करती है एक पहाड़ी शहर को..
हजारों जिंदगियों को
समस्त सनातनियों को

जी हां मैं बात कर रहा हूं जोशीमठ की…
आज इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया ने इस समाचार पर सुर्खियां बनाई पर यह आज की ख़बर नहीं। पूज्यपाद ज्योतिष्पीठाधीश्वर #शंकराचार्यस्वामीश्रीःअविमुक्तेश्वरानंदसरस्वती जी काफी समय से इस पर प्रशासन व सरकार का ध्यान आकृष्ट कराते रहे हैं। सरकार चेती पर तब तक पानी नाक के ऊपर पहुंच चुका था। आज सरकार ने ऐक्सन में दिखी

पर क्या यह स्थायी समाधान है….?
नहीं.. असल में यह समस्या आज की नहीं वरन दशकों पुरानी है। जोशीमठ आदि शंकराचार्य की तपोभूमि रही है। भगवान बद्री विशाल की धरती बद्रीनाथ के निकट सबसे बड़ा सामरिक व धार्मिक नगर है।

पर्यटन की संभावनाओं के चलते लाज धर्मशालाएं बहुमंजिला इमारतों व कालोनियों का धड़ाधड़ निर्माण हुआ। कम क्षेत्रफल पर अधिक लोगों का दबाव। लोगों द्वारा प्रयुक्त जल के नीचे जाने से बने दलदल और उस दलदल में धंसने लगा जोशीमठ।धंसाव के कई और कारण भी हो सकते हैं

पर बी आर ओ, एन टी पी सी के निर्माण कार्यों ने आग में घी डाला इसमें दो राय नहीं

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार श्री जय सिंह रावत के अनुसार अर्नोल्ड हीम और आगस्टो गैस्टर ने अपने यात्रा वृत्तान्त The Throne of God 1938 और शोध ग्रंथ सेंट्रल हिमालया: जियोलॉजिकल आब्जर्वेशन्स आफ द स्विश एस्पीडियन में चमोली गढ़वाल के हेलंग से लेकर तपोवन के क्षेत्र को संवेदनशील बताया था।

पर बात आई और चली गई हमको तो तभी चेतने की आदत है जब पानी सर के ऊपर हो जाए।

आज हजारों जिंदगियों पर एक बसे बसाए धार्मिक नगर पर प्रश्नवाचक चिन्ह लग गया है। जोशीमठ हम सनातनियों के बद्रीनाथ व सिक्खों के हेमकुंड साहब के पास सबसे बड़ा नगर है। धार्मिक व सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

उधर जैन समाज भी अपने एक तीर्थ के अस्तित्व के लिए संघर्ष रत है। आप समझ रहे होंगे धार्मिक स्थल को धार्मिक स्थल ही रहने दें पर्यटन स्थल न बनाएं। हम अपने तीर्थों को पर्यटक स्थल बनाने की भूल कर चुके हैं। कपाट खुलते ही बद्रीनाथ केदारनाथ में बेतहाशा भीड़…
हमारे तीर्थ पर्यटन स्थल नहीं वह ईश्वर के साथ जुड़ाव के द्वार हैं तनिक देर मंदिर के बाहर बैठ कर आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करना चाहिए।
आपाधापी भौतिकता व वासना से दूर ईश्वर की शरण में जाना तो दूर सारा मानसिक कचरा लिए तीर्थों को दूषित कर रहे हैं। वहीं वहां के मूल निवासियों की धन लोलुपता भी छुपी नहीं।

आज न जाने कितने जोशीमठों पर संकट के बादल हैं। बद्रीनाथ केदारनाथ पर उमड़ती भीड़ बढ़ता पर्यटन व्यवसाय प्लास्टिक का उपयोग भूजल का दोहन बड़ी बड़ी बहुमंजिला इमारतें… नहीं नहीं पहाड़ इसके लिए नहीं जाने जाते…।

तो अब दोषी कौन..?
टनल रोपवे धौलीगंगा एन टी पी सी, बी आर ओ परियोजनाएं
समाज या सरकार
अब सरकारें सोती रहीं या आप और हमने त्रुटियाँ की इस पर विचार का समय अभी नहीं है….
इस पर हम चर्चा बाद में करेंगे। पहले हमें जोशीमठ के अस्तित्व की रक्षा करनी है।
भूवैज्ञानिकों पर्यावरणविदों के एक दल को जोशीमठ की भूमि का वैज्ञानिक अध्ययन कर शीघ्र स्थायी समाधान निकालना चाहिए जिससे एक प्राचीन धरोहर को संरक्षित किया जा सके।

उत्तराखण्ड देवभूमि है उसे देवभूमि ही रहने दें। प्रकृति को सजने दें संवरने फलने फूलने दें नहीं तो…?
परिणाम भयावह होंगे। संकट में बद्रीनाथ ही नहीं चारो धाम हैं। केदारनाथ त्रासदी की गूंज अभी तक ताजी है….

“भूमि धंसत ज्योंतिर्मठहिं, हे हरि आप प्रकोप
त्राहिमाम सब जन करत, नासौ आपन कोप ।।”

🙏

परमाराध्य परमधर्माधीश अनन्तश्रीविभूषित उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य जी महाराज की जय हो र 🚩🙏

स्वामी श्रीः दीक्षित शिष्य
मनीष कुमार तिवारीजी

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