अनंतविभूषित पूज्यपाद ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी श्रीः १००८ श्री अविमुक्तेश्वरानंदः सरस्वती जी महाराज
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गुरु चरण धूर माथ धर निज
बस नाम निश दिन ध्यावहूं।
हृदय धर हरि नाम को नित
गुणगान उनकर गावहूं।।
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शंख चक्र गदा धर हरि
गरुण चढ़ दर्शन दये।
गुरुदेव देख लगत ऐसन
अविमुक्त ही मम हरि भये।।
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मात भी मम पित्र हैं
भ्रात सम गुरु लागहीं।
दरश गुरु कर मिलहिं मम
उत्साह मन मह आवहीं।।
:
चल मूर्ति सम हरि के लगत
आभा हरिन कै निरखही।
तेज से परिपूर्ण दृष्टि
हरि के जैसन दिख रही।।
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वामन के जैसन पग धरत
चक्र धर सम वीर हैं।
शेष पर जल शयन करते
गुरु मेरे गंभीर हैं
हां गुरु मेरे गंभीर हैं ।।
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साभार – फेसबुक
स्वामी श्रीः दीक्षित शिष्य
मनीष कुमार तिवारी
परम् धर्माधीशः जगद्गुरु शंकराचार्य
जन्मभूमि – श्रीअनारामधाम






