प्रातः स्मरणीय अनंतश्रीविभूषित द्वयपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज का सन्यासस्थल कोलकाता जहां 1950 में तत्कालीन ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज से उन्होंने सन्यास दीक्षा ली थी ! उसी कोलकाता में पूज्य महाराजश्री का सदण्ड दिव्य विग्रह राजराजेश्वरी सेवामठ, कोंनगर में स्थापित किया गया !
महाराजश्री स्वतंत्रता संग्राम में दो बार जेल जाने वाले,74 चतुर्मास व्रत पूर्ण करने वाले,राम मंदिर का ताला खुलवाने वाले,राम जन्म भूमि व राम मंदिर का फैसला हिंदुओं के पक्ष में करवाने वाले,राम सेतु को बचाने वाले,गंगा जी को राष्ट्रीय नदी घोषित कराने वाले,लाखों धर्मांतरण कर चुके लोगों को वापस सनातनधर्म में लाने वाले,अनेकों गौ सेवालय,वृद्धा आश्रम,निःशुल्क चिकित्सालय,वेद विद्यालय व मन्दिरों की स्थापना करने वाले,संतोषी माता व साईं बाबा मुद्दे पर मुखरता से बोलने वाले व सनातनधर्म को पुष्ट करने हेतु अनेकों अवर्णनीय कार्यों को सम्पादित करने वाले अदुतीय सन्त थे ब्रम्हलीन द्वयपीठाधीश्वर जी महाराज।उनका शिवलिंगाकार मुख का दर्शन करने से पापियों के पाप नष्ट हो जाते थे।ब्रम्हलीन महाराजश्री का हमारे आने वाली पीढियां भी सदैव ऋणी रहेंगी। ब्रम्हलीन महाराजश्री के आदर्शों व इक्षाओं को आज परमाराध्य परमधर्माधीश अनंतश्रीविभूषित उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानंद: सरस्वती'1008' जी महाराज आगे बढ़ा रहे हैं और ब्रम्हलीन महाराज जी के लगभग समस्त महत्वपूर्ण आंदोलनों का कमान भी संभालने वाले वर्तमान ज्योतिष्पीठाधीश्वर जी महाराज की अद्भुत गुरुभक्ति सनातनधर्मियों को सदैव प्रेरणा प्रदान करती रहेगी।